विजयदशमी पर बंगीय समाज के दुर्गा मंडपों में सिंदूर खेला की धूम, विदा हुईं मां दुर्गा

तेज़ एक्सप्रेस न्यूज़/अशोक केशरी

वाराणसी।नवरात्रि में मां दुर्गा के आखिरी दिन यानी विजयदशमी के दिन पंडालों में महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद सभी महिलाएं पान और मिठाई का भोग लगा कर एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यह करीब चार सौ साल पुरानी परंपरा है। इस शुभ दिन और परंपरा को सिंदूर खेला कहा जाता है। शहर के बंग समाज के जुड़े पूजा संस्‍थाओं में मंगलवार को सिंदूर खेला का आयोजन किया गया। इसके तहत सोनारपुरा, दशाश्‍वमेध, शिवाला, पांडेय हवेली, बंगाली टोला, केदारघाट के अलावा बीएचयू व डीरेका में आयोजित पूजा मंडपाें में सिंदूर खेला मे सुहागिन महिलाएं शामिल हुईं। शादीशुदा महिलाएं लाल रंग की साड़ी पहन कर माथे में सिंदूर भर कर पंडाल पहुंच कर दुर्गा मां को उलू ध्‍वनी के साथ विदा कर की।मां दुर्गा की मांग भर कर उन्‍हें मायके से ससुराल किया जाता विदा बंगीय समाज के अध्‍यक्ष अशोक कांति चक्रवर्ती के अनुसार मान्‍यता है कि मां दुर्गा की मांग भर कर उन्‍हें मायके से ससुराल विदा किया जाता है। कहते हैं कि मां दुर्गा पूरे साल में एक बार अपने मायके आती हैं और पांच दिन मायके में रुकने के बाद दुर्गा पूजा होती है। वर्षों पहले वाराणसी में दुर्गा पूजा की शुरुआत करने वाले बंगाली समाज के पूजा पंडालों में सिंदूर खेला की धूम रही। मां के मायके से ससुराल जाने की मान्यता को मानते हुए अपने पति की लम्बी आयु के लिए बंगाली समाज की महिलाओं ने मां को समर्पित होने वाले सिंदूर से अपनी मांग भरकर एक दुसरे के गालों को सिंदूर से भर दिया। मां दुर्गा के सिंदूरदान के बाद महिलाओं ने सिन्दूर से जमकर होली खेली। बंगीय समाज के सचिव देवाशीष दास के अनुसार वाराणसी को दुर्गा पूजा की नज़र से मिनी बंगाल का कहा जाता है आज विजयदशमी के बाद माँ का विसर्जन होता है लेकिन इस विसर्जन से पहले सिंदूर खेला की रस्म निभाई जाती है। मान्यता है कि माँ दुर्गा नवरात्र में अपने बच्चों के साथ माईके आती हैं। ये जब अपने माईके से विदा होती है तो सभी सुहागन औरते मां को सिंदूर लगाने के बाद उस सिन्दूर को आपस में लगाती है मान्यता है की ऐसा करने से पति की उम्र लम्बी होती है इस दौरान माता को मिठाई भी अपने हाथो से सुहागन औरतें खिलाती है और आपस में भी खाती है।

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