प्रथम राष्ट्रपति का जन्मदिवस मनाया गया

तेज़ एक्सप्रेस न्यूज़ – चित्रकूट/संजय साहू

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्मदिवस व अधिवक्ता दिवस जिला न्यायालय के बार एसोसिएशन हॉल में मनाया गया। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के बैनर तले आयोजित हुए कार्यक्रम में प्रभारी जिला जज ने प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र सिंह व सरस्वती माँ के चित्र पर पुष्प अर्पित कर कार्यक्रम की शुरुवात की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रभारी जिला जज रामलखन सिंह सिंगरौर ने राजेंद्र प्रसाद के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति से पहले एक अधिवक्ता थे जिस वजह से आज का दिन उनके राष्ट्रपति होने का नहीं बल्कि अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है और हम सभी जज से पहले एक अधिवक्ता हैं और इस नाते आज हमारे लिए फख्र का दिन है। उन्होंने कहा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। वह भारत के पहले राष्ट्रपति थे। भारत की आजादी की लड़ाई में उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। कांग्रेस में शामिल होने वाले बिहार के वह प्रमुख नेताओं में से थे। वकालत में पोस्ट ग्रैजुएट डॉ. राजेंद्र प्रसाद महात्मा गांधी के बहुत बड़े समर्थक थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 1931 में सत्याग्रह आंदोलन और 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन के लिए माहात्मा गांधी के साथ जेल भी जाना पड़ा था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद साल 1934 से 1935 तक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। 1946 में हुए चुनाव के बाद उन्हें केंद्र सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री बनाया गया था। राष्ट्र के प्रति उनके योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सबसे बड़े पुरस्कार भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव नम्रता शर्मा ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए समापन उद्बोधन में कहा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में काफी तेज छात्र माने जाते थे। उन्हे कलकत्ता विश्विद्यालय की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर हर महीने 30 रुपये की स्कॉलरशिप से पुरस्कृत किया गया था और इसके बाद साल 1902 में उन्होंने प्रसिद्ध कलकत्ता प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया था। वह इतने बुद्धिमान थे कि एक बार परीक्षा के दौरान कॉपी चेक करने वाले अध्यापक ने उनकी शीट पर लिख दिया था कि ‘परीक्षा देने वाला परीक्षा लेने वाले से ज्यादा बेहतर है’। अपने जीवन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने परिवार और शिक्षा के लिए बहुत त्याग किया। साल 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें इंडियन सोसायटी से जुड़ने का प्रस्ताव दिया, लेकिन पारिवारिक और पढ़ाई की जिम्मेदारियों के चलते उन्होंने इस प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने जीवन के उस वक्त को बेहद तकलीफ देने वाला बताया है और उन्हीं परिस्थितियों के कारण पहली बार उनकी पढ़ाई पर असर पड़ा और हमेशा टॉप करने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद लॉ की परीक्षा को सिर्फ पास ही कर पाए।

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